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कुदरत की खूबसूरती के साथ ही मानसिक शांति भी मिलती है अल्मोड़ा के कसार देवी मंदिर में

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अल्मोड़ा का कसार देवी
अल्मोड़ा के प्रसिद्व कसार देवी मंदिर का फाइल फोटो

उत्तराखंड को देवभूमि भी कहा जाता है। यहां की प्राकृतिक घटा अपना मन मोह लेती है। जिससे बार-बार आपको यहां आने का मन करता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं उत्तराखंड के अल्मोड़ा के कसार देवी मंदिर के बारे में। इस मंदिर के दर्शन करने के साथ ही आपको कुदरत की खूबसूरती के तो दर्शन होंगे ही साथ ही मानसिक शांति भी मिलेगी।

हम आपको बता दें कि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर है कसारदेवी का मंदिर। इस मंदिर के दर्शन के साथ आपको जहां एक तरफ कुदरत की खूबसूरती नजर आएगी वहीं मानसिक शांति भी मिलेगी। कहा जाता है कि कसारदेवी मंदिर में चुंबकीय शक्ति के केन्द्र हैं।

दुनिया में तीन ही पर्यटन स्थल ऐसे हैं जहां चुंबकीय शक्ति के केन्द्र हैं। उसमें से एक है कसारदेवी शक्तिपीठ। अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञान संगठन नासा के वैज्ञानिक चुम्बकीय रूप से इन तीनों जगहों के चार्ज होने के कारणों पर शोध कर रहे हैं। कहते हैं कि इन तीनों धर्म स्थलों पर हजारों साल पहले सभ्यताएं बसी थीं।

पर्यावरण के जानकारों की मानें तो कसारदेवी मंदिर के आसपास वाला पूरा क्षेत्र वैन एलेन बेल्ट है। जहां धरती के अंदर विशाल चुंबकीय पिंड हैं। पिछले कई सालों से नासा के वैज्ञानिक इस पर शोध कर रहे हैं। इस वैज्ञानिक अध्ययन में यह भी पता लगाया जा रहा है कि मानव मस्तिष्क या प्रकृति पर इस चुंबकीय पिंड का क्या असर पड़ता है। अब तक हुए इस अध्ययन में पाया गया है कि अल्मोड़ा स्थित कसारदेवी मंदिर और दक्षिण अमेरिका के पेरू स्थित माचू-पिच्चू व इंग्लैंड के स्टोन हेंग में अद्भुत समानताएं हैं।

स्वामी विवेकानंद 1890 में ध्यान के लिए कुछ महीनों के लिए यहां आए थे। बताया जाता है कि अल्मोड़ा से करीब 22 किमी दूर काकड़ीघाट में उन्हें विशेष ज्ञान की अनुभूति हुई थी।

इसी तरह बौद्ध गुरु लामा अंगरिका गोविंदा ने गुफा में रहकर विशेष साधना की थी। हर साल इंग्लैंड से और अन्य देशों से अब भी शांति प्राप्ति के लिए सैलानी यहां आकर कुछ महीनों तक ठहरते हैं। स्वामी विवेकानंद ने 11 मई 1897 को अल्मोड़ा के खजांची बाजार में जन समूह को संबोधित करते हुए कहा था कि यह हमारे पूर्वजों के स्वप्न का देश है। भारत जननी श्री पार्वती की जन्म भूमि है। यह वह पवित्र स्थान है जहां भारत का प्रत्येक सच्चा धर्मपिपासु व्यक्ति अपने जीवन का अंतिम काल बिताने को इच्छुक रहता है।

उल्लेखनीय है कि 1916 में स्वामी विवेकानंद के शिष्य स्वामी तुरियानंद और स्वामी शिवानंद ने अल्मोड़ा में ब्राइटएंड कार्नर पर एक केंद्र की स्थापना कराई, जो आज रामकृष्ण कुटीर नाम से जाना जाता है।

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