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गरीब और आदिवासी बच्चों का गुरुकुल है “किस” और भगवान के रूप हैं डां. अच्युत सामंत

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डॉ. अच्‍युत सामंत
डॉ. अच्‍युत सामंत का फाइल फोटो

IDEIN NEWS SPECIAL: गरीब आदिवासी बच्चों के भविष्य को संवारने के अपने मिशन पर रोजाना करीब 50 लाख रुपये खर्च करने वाले डां. अच्युत सामंत आज भी अपने किराये के मकान में रहते हैं। देश-दुनिया के सबसे बड़े आदिवासी आवासीय स्कूल को चलाने वाले सामंत उन बच्चों और उनके परिजन के लिए भगवान का दूसरा रूप हैं।

गरीब और आदिवासी बच्चों के लिए भगवान डां. अच्युत सामंत
गरीब और आदिवासी बच्चों के लिए भगवान डां. अच्युत सामंत

आदिवासी बच्चों को बिना फीस उच्च आवासीय और शैक्षिक वातावरण मिलें, अपने इस मिशन के साथ ही डॉ. अच्‍युत सामंत ने उड़ीसा के भुवनेश्वर में कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेस (KISS) जैसे गुरुकुल की स्थापना की। आज दुनिया के सबसे बड़े इस आदिवासी आवासीय स्कूल में करीब 25 हजार आदिवासी बच्चे अपना भविष्य संवार रहे हैं।

आदिवासी बच्चों का गुरुकुल है “किस” (KISS)

आदिवासी बच्चों का गुरुकुल है “किस”

आज डॉ. अच्‍युत सामंत के इस मंदिर में करीब 62 से ज्यादा आदिवासी समूहों के बच्चे ज्ञान का प्रसाद ले रहे हैं। आंकड़ों की बात करें तो करीब-करीब 2248 लड़कियां और 12803 लड़के इस समय KISS में पढ़ रहे हैं। कभी 125 बच्चों के साथ अपने मिशन का सफर शुरू करने वाले सामंत के इस मंदिर में आज 25 हजार बच्चे शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्र प्रेम की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

विश्व पटल पर है “कीस” की अपनी पहचान

विश्व पटल पर है कीस की अपनी पहचान

हम कह सकते हैं कि जिस गुरुकुल की परंपरा ने भारत को विश्व पटल में जगत गुरु बनाया आज उसी परंपरा को कीस (KISS) निभाते हुए राष्ट्र के कल्याण में आगे बढ़ता जा रहा है।

अच्युत सामंत अपने तप, त्याग और तपस्या से खड़ा किया यह मंदिर
अच्युत सामंत अपने तप, त्याग और तपस्या से खड़ा किया यह मंदिर

कोई भी बच्चा बिना स्कूल के नहीं रहे, हर लड़की पढ़ें, सीखे और बिना डर के आगे बढ़ें और आदिवासी बच्चों का एक सुनहरा भविष्य हो अपने इस मिशन के साथ ही अच्युत सामंत ने कीस (KISS) मंदिर की नींव रखी। अच्युत सामंत किसी बड़े राजघराने से नहीं आते हैं। सामंत जब चार साल के थे तो उनके पिता का देहांत हो गया था। उनका सबसे छोटा भाई उस समय केवल एक महीने का था। परिवार में इस संकट की घड़ी में उनकी मां ने सब्जी बेचकर बच्चों की परवरिश की।

अच्‍युत सामंत ने मां के काम में सहयोग किया और साथ ही साथ समय निकालकर अपनी पढ़ाई को भी जारी रखा। सामंत ने केमिस्ट्री विषय से मास्टर डिग्री ली और एक कॉलेज में अध्यापक बन गये। मन में कुछ अलग और दिल में बड़ा करने का जुनून था तो कैसे ज्यादा दिन अध्यापन की नौकरी में रूक सकते।

5000 रुपये से शुरू किया कीट (KIIT)

5000 रुपये से शुरू किया कीट (KIIT)

डां. अच्युत सामंत ने मात्र पांच हजार रुपये की अपनी जमापूंजी से वर्ष 1992-1993 में कलिंगा इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्‍नोलॉजी (KIIT) की स्‍थापना की। आज कलिंगा इंस्टीट्यूट का अपना 25 किलोमीटर का कैंपस है। कलिंगा के पास अपनी 22 इको फ्रेंडली बिल्डिंग हैं।

आज कीट (KIIT) के अपने इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, बिजनेस और दूसरे कॉलेज हैं। अपना बड़ा अस्पताल है। हम कह सकते हैं कि आज कीट (KIIT) के पास अपनी सबसे बड़ी लॉ लाइब्रेरी है।

10 हजार का शैक्षणिक स्टाफ है कीस (KISS) और कीट (KIIT) के पास
यह डां.अच्युत सामंत की मेहनत, लगन और निष्ठा का ही परिणाम है कि आज कीस (KISS) और कीट (KIIT) के पास अपना 10 हजार से ज्यादा शैक्षणिक स्टाफ है। कीट (KIIT) आज पूर्वी भारत का सबसे बड़ा विश्‍वविद्यालय है।

ऐसे अपने लक्ष्य की ओर चले डां. अच्युत सामंत

ऐसे अपने लक्ष्य की ओर चले डां. अच्युत सामंत

डां. अच्युत सामंत की मानें तो जब कीट (KIIT) एक बड़े विश्‍वविद्यालय के रूप में स्थापित हो चुका था तो मैं अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करने की तरफ बढ़ा। मैंने कलिंग इंस्‍टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (KISS) की स्थापना की। मैंने अपना जीवन आर्ट ऑफ गिविंग के लिए समर्पित कर दिया। क्योंकि आदिवासी बच्चों की पीड़ा और गरीबी को मुझसे बेहतर कौन जान सकता था। मैंने आदिवासी बच्चों को नक्सली बनते देखा है।

कीट (KIIT) की कमाई कीस (KISS) में आदिवासी बच्चों का सवंरता है भविष्य
कीट (KIIT) की कमाई कीस (KISS) में आदिवासी बच्चों का सवंरता है भविष्य

आज पच्चीस हजार से ज्यादा आदिवासी बच्चे। आगे का इससे और बड़ा लक्ष्य। कई प्रदेशों में कीस (KISS) का विस्तार। कीस (KISS) की हॉस्टल मेस में प्रतिदिन करीब सात हजार किलो चावल बनता है। करीब 17सौ किलो सब्जी आती है। दाल-आटे के अलावा और कई सामान जिसका हिसाब अलग है। सबसे बड़ी बात 25 हजार आदिवासी बच्चों में करीब 60 फीसदी लड़कियां।

डां सामंत बताते हैं कि कीट से हमारे पास जो पैसा आता है उसको हम कीस में आदिवासी बच्चों पर खर्च करते हैं। कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी यानी (KIIT) के तहत चलने वाले तमाम इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, बिजनेस वगैरह के कॉलेजों के कुल टर्नओवर का 5 परसेंट सीधे (KISS) यानी कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज को जाता है। इससे सालाना करीब 39 करोड़ (KISS) को मिलते हैं। इसके अलावा (KIIT) के सारे स्टाफ अपनी सैलरी का 3 परसेंट (KISS) को देते हैं जिससे करीब 4 करोड़ जमा होता है।

इसके साथ ही (KIIT) का काम करने वाले कांट्रैक्टर और वेंडर अपनी कमाई का 2-3 परसेंट (KISS) को दान करते हैं जिससे लगभग 6 करोड़ जुटता है। दूसरे संगठनों, कॉरपोरेट और संपन्न लोगों के दान से करीब 15 करोड़ (KISS) में जमा होते हैं। (KISS) के बच्चों द्वारा तैयार सामान बेचकर 3 करोड़ के लगभग जुटाया जाता है।

कीस (KISS) के 25 बच्चों की भुवनेश्वर में मानव श्रृंखला आदिवासी बच्चों की दुनिया की सबसे बड़ी ह्यूमन चेन है। अच्युत सामंत खुश हैं कि आज कीस के बच्चे सभी क्षेत्रों में नाम कमा रहे हैं। ओलंपिक गेम तक की चयन प्रक्रिया से गुजरे हैं।

ऐसे हैं डां. अच्युत सामंत

ऐसे हैं डां. अच्युत सामंत

25 हजार आदिवासी बच्चों का जीवन संवारने वाले डां. अच्युत सामंत आज भी एक आम नागरिक की तरह सबसे मिलते हैं। वह अविवाहित हैं। आज भी वह खुद एक किराए के मकान में रहते हैं।

अपनी सफलता को डां. अच्युत सामंत कुछ इस तरह बताते हैं, “अथक परिश्रम, निरंतर अपने लक्ष्य की और बढ़ना और ईश्वर कृपा, इसी से सब संभव हो पाता है।” ‘कीस’ को शुरू करने के बारे में पूछने पर सामंत बताते हैं कि उनके अनुसार शिक्षा द्वारा ही गरीबी के अभिशाप से मुक्त हुआ जा सकता है।

डां. अच्युत सामंत बड़े ही गर्व से बताते हैं कि विशेष कार्यक्रमों का आयोजन और विशेष कक्षाओं के माध्यम से इन आदिवासी बच्चों को उनके मूल से जोड़ा जाता है, बल्कि कीस के छात्र तो अपने आदिवासी होने पर गर्व महसूस करते हैं और उनमे एक स्वाभिमान का भाव देखने कोप मिलता है।

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